उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित मयाली, तिलवाड़ा, विजयनगर और चन्द्रापुरी बाजार कभी भी भयानक खतरे का सामना कर सकते हैं । इनके बीचों-बीच बहने वाले बरसाती गदेरे कभी भी विकराल रूप धारण कर सकते हैं, जैसा कि 2013 की मंदाकिनी घाटी की बाढ़ में देखा गया था। उस आपदा में सोनप्रयाग, चंद्रापुरी, तिलकनगर, गंगानगर, विजयनगर और तिलवाड़ा जैसे क्षेत्रों में भारी तबाही हुई, जहां नदियों का उच्च डिस्चार्ज, बैंक कटाव और फ्लैश फ्लड्स ने जान-माल का भारी नुकसान किया। नदी के किनारों पर बने टैरेस (RBM – River Borne Material) पर बाढ़ ने 1-6 मीटर मोटी तलछट जमा की और नदी का मार्ग 2-15 मीटर तक बदल दिया।

हिमालय क्षेत्र टेक्टोनिक रूप से सक्रिय है, जहां मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT), वैकृत थ्रस्ट (VT) और मंदाकिनी फॉल्ट जैसी भ्रंश रेखाएं मौजूद हैं। ये चट्टानों को कमजोर बनाती हैं, जिससे भूस्खलन (Landslides) आसान हो जाते हैं। जिले में 290 भूस्खलन दर्ज हुए, जिनमें 65% डेब्रिस (मलबा )स्लाइड्स थे, जो भारी बारिश से संतृप्त मिट्टी के कारण हुए। सड़कें और गदेरे के पास 76% भूस्खलन हुए, जहां ढलान संशोधन या टो इरोजन (कटाव) मुख्य कारण थे।

22 क्लाउडबर्स्ट घटनाएं दर्ज, जिनमें विजयनगर जैसी जगहें शामिल। ये 100 मिमी/घंटा से अधिक बारिश वाली घटनाएं हैं, जो फनल-आकार की घाटियों में होती हैं और डेब्रिस फ्लो का कारण बनती हैं। 2013 में ये आपदाएं उखीमठ तहसील में 41% थीं।

बाढ़ ने केदारनाथ में नदी मार्ग बदल दिए, रामबाड़ा जैसे शहर बह गए। डाउनस्ट्रीम में चंद्रापुरी और विजयनगर में नदी बेड 5-6 मीटर ऊंचा हो गया, जिससे भविष्य में और बाढ़ का खतरा बढ़ा।

ग्लेशियर पिघलाव (जैसे गंगोत्री ग्लेशियर 20-22 मीटर/वर्ष की दर से पीछे हट रहा) और बढ़ते तापमान (IPCC के अनुसार 1.6-3°C तक) से बारिश की तीव्रता बढ़ रही है, जो फ्लैश फ्लड्स और भूस्खलन को ट्रिगर करती है।
जंगलों की कटाई और अनियोजित विकास से मिट्टी का कटाव बढ़ता है, जिससे गदेरों में मलबा जमा होता है।

हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स (जैसे सिंगरोली-भटवाड़ी HEP) से डेब्रिस डंपिंग और सड़क निर्माण ढलानों को अस्थिर बनाते हैं। नदी किनारों पर निर्माण टो इरोजन को बढ़ावा देता है, जिससे बैंक फेलियर और लैंडस्लाइड्स होते हैं। हिमालय में बढ़ते निर्माण से घातक फ्लैश फ्लड्स का खतरा और बढ़ गया है, जैसा कि हालिया घटनाओं में देखा गया।

ये गदेरे भारी बारिश में डेब्रिस फ्लो और फ्लैश फ्लड्स लाते हैं, जो इनके किनारों पर बने ढांचों को बहा ले जाते हैं। बाबजूद इसके भी लोग यहां बड़े स्तर पर निर्माण कार्य कर रहे हैं, 2013 में RBM टैरेस पर बने बाजार तबाह हुए क्योंकि ये तलछट जमा करने वाली जगहें हैं, जहां बाढ़ आसानी से घुस सकती है।

विशेषज्ञ कहते हैं कि नदी से 50-100 मीटर दूरी रखें, और कोलुवियम या ग्लेशियल सेडिमेंट्स (ग्लेशियल तलछट) पर निर्माण न करें। अन्य जगहों की आपदाओं (जैसे 2023 हिमाचल और सिक्किम) से सबक लें, अनियोजित विकास रोकें! अन्यथा आने वाले समय में इसके परिणाम प्रलयंकारी साबित होंगे..!!

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