NGT नियमों की उड़ रही धज्जियां: मंदाकिनी किनारे अवैध खनन से कमजोर हो रहा बांसवाड़ा पुल

2013 की त्रासदी से नहीं लिया सबक: खनन माफियाओं के आगे बेबस प्रशासन, खतरे में केदारघाटी

रुद्रप्रयाग जिले की केदारघाटी में एक बार फिर पर्यावरणीय नियमों की धज्जियां उड़ते नजर आ रही हैं। बांसवाड़ा-बसुकेदार को जोड़ने वाला पुल, जो 2013 की भीषण आपदा में पहले ही कई बार क्षतिग्रस्त हो चुका है, आज भी खनन माफियाओं के हमलों से सुरक्षित नहीं है। पुल से महज 10 मीटर की दूरी पर पोकलैंड जैसी भारी मशीनों से धड़ल्ले से खनन चल रहा है, जिससे पुल की नींव कमजोर होने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

2013 की केदारनाथ आपदा में मंदाकिनी नदी के उफान ने हजारों जानें लीं और पुलों-मकानों को बहा ले गई। उस आपदा के मुख्य कारणों में से एक था नदियों के किनारों पर अनियंत्रित खनन, जो नदी के प्रवाह को बाधित करता है और भूस्खलन-बाढ़ को न्योता देता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी संवेदनशील घाटियों में खनन से नदी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है, जिससे भविष्य में बड़ी तबाही का खतरा बढ़ जाता है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने नदी खनन के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं। सस्टेनेबल सैंड माइनिंग मैनेजमेंट गाइडलाइंस 2016 और 2020 के अनुसार:

– पुलों, वाटर इंटेक्स या अन्य महत्वपूर्ण संरचनाओं से 200-500 मीटर की दूरी पर ही खनन की अनुमति हो सकती है।
– पुलों से कम से कम 100 मीटर (कुछ मामलों में अधिक) की दूरी अनिवार्य है।
– आपदाग्रस्त या संवेदनशील इलाकों में खनन पर विशेष प्रतिबंध हैं।
– भारी मशीनों का उपयोग, रात में खनन और बिना पर्यावरणीय मंजूरी के कार्य निषिद्ध है।

लेकिन इन नियमों का पालन जमीनी स्तर पर कहीं नहीं दिखता। पर्यावरण विशेषज्ञों ने खुलासा किया है कि खनन पट्टे की आड़ में NGT के मानकों को ताक पर रखा जा रहा है। मंदाकिनी नदी किनारे पोकलैंड मशीनों से खनन की अनुमति दी गई है जो कि मानकों के विरुद्ध है, जबकि पुल के इतने करीब खनन से नींव हिलने का खतरा है। प्रशासन की लापरवाही साफ झलकती है—2013 की आपदा से सबक लेने के बजाय वही गलतियां दोहराई जा रही हैं।

खनन माफिया और स्थानीय प्रशासन के बीच सांठगांठ के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। हाल के रिपोर्ट्स में भी रुद्रप्रयाग की मंदाकिनी नदी में अवैध खनन के कई मामले उजागर हुए हैं, जहां नदी का सीना चीरा जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पुलों और आपदाग्रस्त क्षेत्रों के आसपास खनन पट्टे देना घातक साबित हो सकता है। यदि यही सिलसिला जारी रहा तो मद्महेश्वर घाटी और केदारघाटी में बड़ी आपदा फिर से आ सकती है, जिससे जान-माल का भारी नुकसान होगा।

प्रश्न उठता है—प्रशासन कब जागेगा? क्या खनन माफियाओं के दबाव में NGT के नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रहेंगे? स्थानीय निवासियों, तीर्थयात्रियों और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए तत्काल कार्रवाई जरूरी है। जिला प्रशासन, खनन विभाग और NGT को इस मामले की गंभीरता से जांच करनी चाहिए, दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और ऐसी गतिविधियों पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद हो, वरना 2013 की त्रासदी फिर दोहराई जा सकती है!

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