तिलवाड़ा। सरकार सड़कें गड्ढामुक्त करने के दावे कर रही है, लेकिन तिलवाड़ा-सूर्यप्रयाग-मुसाडुंग मोटर मार्ग की तस्वीर इन दावों को आईना दिखा रही है। वर्ष 2023 में करीब 72 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद जिस सड़क का डामरीकरण दो साल भी नहीं टिक पाया, वह आज बारिश में तालाब और जगह-जगह गड्ढों में तब्दील हो चुकी है।
सुमाड़ी कस्बे से सटी सड़क की हालत इतनी खराब है कि पैदल चलना तक मुश्किल हो गया है। बारिश होते ही सड़क पर बने गड्ढे पानी से भर जाते हैं और वाहन चालकों को अंदाजा तक नहीं रहता कि गड्ढा कितना गहरा है। ऐसे में हर समय दुर्घटना का खतरा बना हुआ है।
72 लाख का काम आखिर कितने दिन चला?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सड़क सुधार और डामरीकरण के लिए 72 लाख रुपये की धनराशि स्वीकृत हुई थी तो आखिर वह पैसा कहां और कैसे खर्च हुआ?
यदि काम नियमों और निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुसार हुआ था तो महज दो वर्ष के भीतर सड़क की यह दुर्दशा कैसे हो गई? क्या निर्माण में इस्तेमाल सामग्री की गुणवत्ता की जांच हुई थी? क्या कार्य की तकनीकी जांच की गई? क्या अधिकारियों ने मौके पर जाकर कार्य की गुणवत्ता परखी थी?
इन सवालों का जवाब आज जनता मांग रही है।
ईई, एई और जेई की निगरानी पर भी सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सड़क निर्माण और मरम्मत कार्यों में ठेकेदार के साथ-साथ लोक निर्माण विभाग के ईई, एई और जेई की निगरानी की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। यदि विभागीय अधिकारियों की मौजूदगी और निरीक्षण के बावजूद सड़क दो साल में उखड़ गई तो फिर जिम्मेदारी किसकी है?
लोगों में यह भी आरोप है कि विभागीय निर्माण कार्यों में कथित कमीशनखोरी और ठेकेदारों से मिलीभगत के चलते गुणवत्ता से समझौता किया जाता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो केवल ठेकेदार ही नहीं, बल्कि निगरानी और सत्यापन करने वाले संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
जनता सड़क पर, विभाग ‘बजट’ के पीछे!
स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क की बदहाली को लेकर कई बार लोक निर्माण विभाग को सूचना दी जा चुकी है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल आश्वासन मिल रहे हैं। अब विभाग बजट का अभाव बताकर अपनी जिम्मेदारी से बचता नजर आ रहा है।
जनता का सवाल है—जब सड़क निर्माण के लिए लाखों रुपये का बजट उपलब्ध था, तब सड़क की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी? और अब सड़क टूटने के बाद फिर से बजट की जरूरत क्यों पड़ रही है?
अगर हर दो-तीन साल में सड़क के लिए नया बजट चाहिए तो पुराने बजट से हुए काम की गुणवत्ता की जवाबदेही कौन लेगा?
वाहनों की मरम्मत का बढ़ा खर्च
गड्ढों के कारण इस मार्ग से गुजरने वाले वाहन चालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। वाहन चालकों के अनुसार खराब सड़क के कारण वाहनों के पट्टे, चेबर और अन्य महत्वपूर्ण कल-पुर्जे आए दिन खराब हो रहे हैं। यानी सरकारी सड़क की खराब गुणवत्ता का आर्थिक बोझ भी अब आम जनता और वाहन मालिकों की जेब पर पड़ रहा है।
कस्बे की सड़क का यह हाल तो गांवों की हालत क्या होगी?
सुमाड़ी कस्बे से सटी मुख्य सड़क की यह हालत देखकर ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। सवाल यह भी है कि यदि विभाग प्रमुख कस्बों और बाजारों से जुड़ी सड़कों की मरम्मत नहीं कर पा रहा है तो दूरस्थ गांवों की सड़कों का जिम्मेदार कौन है?
जांच हुई तो खुल सकती है ’72 लाख’ की पूरी कहानी
स्थानीय लोगों ने जिलाधिकारी और शासन से मांग की है कि वर्ष 2023 में स्वीकृत 72 लाख रुपये के कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए। सड़क की वर्तमान स्थिति का तकनीकी सर्वे कराया जाए और यह जांचा जाए कि निर्धारित मानकों के अनुरूप सामग्री का इस्तेमाल हुआ था या नहीं।
साथ ही ईई, एई, जेई और संबंधित ठेकेदार की भूमिका की भी जांच की जाए। कार्य की एमबी, भुगतान, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट और मौके पर हुए वास्तविक कार्य का मिलान कराया जाए। यदि जांच में गुणवत्ता से समझौता, सरकारी धन के दुरुपयोग, लापरवाही या कमीशनखोरी के आरोपों की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक सड़क के गड्ढों का नहीं है—सवाल 72 लाख रुपये के सरकारी धन और उस पैसे से जुड़े जनता के अधिकार का है।
सरकार कहती है ‘गड्ढामुक्त सड़क’, लेकिन तिलवाड़ा-सूर्यप्रयाग-मुसाडुंग मार्ग पूछ रहा है—घोषणाओं से सड़कें बनेंगी या गुणवत्ता और जवाबदेही से?

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